समर्पण

मेरे चाचा पंडित श्री श्रीनाथ गोस्वामी । 
मेरी पत्नी केश कुमारी एवं पुत्री दिविता 

मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ

मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ

रवि रंजन गोस्वामी 

समर्पण

मेरे चाचा पं श्री श्रीनाथ गोस्वामी

मेरी पत्नी श्रीमती केश कुमारी गोस्वामी एवं पुत्री कु॰ दिविता गोस्वामी


 

© 2016   रवि रंजन गोस्वामी

goswamirr@hotmail.com

यह कहानियाँ पूरी तरह से कल्पनिक हैं  इनमें  प्रयुक्त नाम, पात्र, संगठन, और घटनायेँ भी लेखक के मस्तिष्क की उपज हैं

 


 

 

अनुक्रमणिका

१ –भरोसा                      

२ –अहसास                     

३ –मंकी बंदर                   

४ –विस्थापित                   

५ –इतिहास का भूगोल             


 

भरोसा

राजीव स्वामी किराये के मकान में रहते थे । हर माह किराया समय पर देते फिर भी मकान मालिक की टोका टाकी चलती रहती थी । दो मंज़िला मकान था । नीचे मकान मालिक और ऊपर की मंजिल में राजीव अपनी पत्नी सुषमा और दो पुत्रियों गुड्डी और छुटकी के साथ रहते थे । मकान का किराया कम था लेकिन मकान की हालत अच्छी नहीं थी । मकान मालिक से रख रखाव के विषय में बात करते तो वह कहता , “आप मरम्मत करा लीजिये जो खर्चा होगा किराये में एडजस्ट कर लेंगे।”

आखिरकार उन्होंने पुरानी दिल्ली की एक गली में एक पुराना बना बनाया मकान खरीद लिया । दो कमरे , रसोई , गुशलखाना और शौचालय । मकान के आगे एक संकरा चबूतरा था । ऊपर एक छोटी सी छत ।

थोड़ा और पैसा खर्च करके मकान की छिटपुट मरम्मत और रंग रोगन लगा कर उसे रहने लायक बना लिया ।

मकान की लोकेशन अच्छी थी । स्कूल ,दवाखाना ,डाकखाना , बस स्टॉप सब नजदीक थे और बाज़ार के लिए तो यह कहना मुश्किल था कि गली में बाज़ार था या बाज़ार में गली थी । गुड्डी और छुटकी को पास की प्राथमिक पाठशाला में कक्षा 1 और यू के जी में दाखिला मिल गया । राजीव जिस उप डाकघर में पोस्ट मास्टर के पद पर तैनात थे वो भी नजदीक था । वह कभी साइकिल से और कभी पैदल की ड्यूटी पर चले जाते थे। शाम को घर भी समय से वापस आ जाते ।

सबकुछ ठीक था लेकिन सुषमा को शिकायत थी कि पड़ोस अच्छा नहीं था । ऐसा कहने की वजहों में एक वजह था गब्बर और उसका कुत्ता भूरे ।

एक दिन दोपहर जब गुड्डी और छुटकी स्कूल से लौटीं तो घर के बाहर ठिठक कर रुक गयीं । उन्होंने देखा घर के चबूतरे पर एक व्यक्ति लेटा हुआ था । उस व्यक्ति ने अपना चेहरा एक रूमाल से ढाँप रखा था ।

उसने अपने चेहरे से रुमाल हटाया और उठ बैठा । उसके बिखरे हुए बाल , लाल आँखें , बड़ी नाक और चेचक के दाग लिये काला चेहरा बच्चियों को डराने के लिये काफी था । छुटकी चिल्लायी , “मम्मी !” और गुड्डी के पीछे छिपकर खड़ी हो गयी । सुषमा को मालूम था बेटियों के स्कूल से लौटने का समय हो गया है । उसके कान दरवाजे पर ही लगे थे । छुटकी की आवाज पर वो दौड़ी और दरवाजा खोल कर देखा तो पाया गुड्डी और छुटकी सहमी खड़ी थीं और एक काला और बदसूरत आदमी उसके चबूतरे से उतर रहा था । उसने एक बार पलट कर सुषमा की ओर देखा और फिर चला गया। गुड्डी और छुटकी भागकर अंदर आ गयीं । सुषमा ने दरवाजा बंद कर दिया ।

वो कौन था मम्मी?” गुड्डी ने सुषमा से पूंछा ।

“पता नहीं कौन था । पापा से पूंछेंगे ?”

फिर वो लड़कियों के लिये खाना निकालने चली गयी । दोनों बेटियों को खाना खिलाकर उन्हें घर के अंदर ही खेलने और बिना पूंछे किसी को दरवाजा न खोलने की हिदायत देकर वह आराम करने के लिये पलंग पर जाकर लेट गयी । एक उम्र विशेष में बच्चे अधिकतर माँ बाप के इर्द गिर्द ही रहना पसंद करते हैं । गुड्डी और छुटकी भी थोड़ी देर में सुषमा के आजू बाजू लिपट कर सो गयी।

थोड़ी देर विश्राम कर सुषमा उठ गयी और घर के कामों में लग गयी । लड़कियां भी उठकर खेल में लग गयीं । बाहर से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रहीं थीं । गुड्डी और छुटकी भी बाहर जाकर खेलना चाहतीं थीं किन्तु अभी पड़ोस के बच्चों को जानती नहीं थी और दोपहर वाला डरावना आदमी भी उन्हें याद था । अतः बाहर जाने का सवाल ही नहीं था ।

लगभग सवा पांच बजे राजीव ऑफिस से घर पहुंचा । उसने देखा खाकी पेंट शर्ट पहने एक तीस पैंतीस साल का बेतरतीब बालों वाला काला आदमी चबूतरे पर एक किनारे बैठा है । उस व्यक्ति ने राजीव को देखा लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । राजीव ने भी कुछ नहीं कहा । चबूतरा ज्यादा ऊंचा नहीं था । हालाकि चढ़ने के लिये एक पत्थर का स्टेप बना  था । राजीव ने दरवाजे की घंटी बजाई और साथ ही आवाज दी “गुड्डी !”

घंटी की आवाज सुनकर गुड्डी और छुटकी दरवाजे की ओर भागीं । उनके पीछे सुषमा गयी । गुड्डी ने पंजों के बल खड़े होकर सांकल खोल कर दरवाजा खोल दिया । छुटकी पापा पापा कहते हुए राजीव की टांगों से लिपट गयी । राजीव ने उसे गोद में उठा लिया ।

“पापा आज बाहर एक बाबा बैठा था ।” छुटकी ने कहा ।

“हाँ पापा एक डरावना आदमी हमारे चबूतरे पर लेटा था,” गुड्डी भी बोल पड़ी ।

राजीव ने आश्वस्त करने के लिये कहा , “कोई भिकारी या राहगीर रहा होगा ।”

लेकिन था वाकई अजीब और डरावना सा,” सुषमा ने बेटियों की बात का समर्थन किया ।

फिलहाल राजीव के घर आ जाने से सभी निश्चिंत होकर अपने अपने काम में लग गये ।

दूसरे दिन भोर में चबूतरे पर झाड़ू लगाते हुए जब सुषमा उस स्थान को बुहार रही थी जहां उस व्यक्ति को लेटे हुए देखा था वह अज्ञात भय से सिहर गयी । उसे उस स्थान पर अजीब सी गंध का एहसास हुआ। उसने धोती के पल्लू से मुंह ढक लिया । बुहारने के बाद उसने दो बाल्टी पानी डालकर चबूतरे को धो डाला । उसे कुछ तसल्ली हुई ।

लड़कियों को स्कूल के लिये छोडने वह नुक्कड़ तक गयी। उनको हाथ हिला कर विदा करने के बाद वो वापस आयी तो देखा कि चबूतरा ठीक से सूखा भी नहीं था वह व्यक्ति चबूतरे पर उसी स्थान पर आ बैठा था । लेकिन उससे कुछ कहने सुनने की हिम्मत उसमें नहीं थी । वह लौटकर सीधे घर के अंदर चली गयी ।

थोड़ी देर बाद उसने दरवाजे से झांककर देखा तो वह व्यक्ति वहाँ नहीं था । गुड्डी और छुटकी जब स्कूल से लौटीं तो वो पहले से ही दरवाजा खोल कर खड़ी थी कि लड़कियां डर न जाएँ । किन्तु वह उस समय वहाँ नहीं था । 

शाम को राजीव ऑफिस से लौटा तो वह व्यक्ति कंबल ओढ़े चबूतरे पर बैठा इत्मिनान से सिगरेट पी रहा था । उसके पैरों के पास एक भूरे रंग का कुत्ता बैठा था जिसके गले में लाल रंग का पट्टा था । राजीव जब करीब पहुंचा तो कुत्ता उसकी तरफ देखता हुआ खड़ा हो गया । उसके कान खड़े हो गये लेकिन वो भौंका नहीं और धीरे धीरे पूंछ हिलाता रहा । उस व्यक्ति ने झुक कर कुत्ते की पीठ पर हाथ फेरा । कुत्ता बैठ गया ।

राजीव उस व्यक्ति के थोड़ा करीब गया । कुत्ता सजग होकर फिर खड़ा हो गया । व्यक्ति ने उसे पुचकारा तो वह उछल कर चबूतरे पर चढ़ कर उसकी बगल में सट कर बैठ गया ।

व्यक्ति ने राजीव को देखा । राजीव कुत्ते की ओर से थोड़ा आश्वस्त हुआ तो उसने उस व्यक्ति से पूंछा , “तुम कौन हो ? यहाँ क्यों बैठे रहते हो ?”

“मैं गब्बर हूँ । ये मेरी जगह है और मुझे यहाँ बैठना सुहाता है । तुम कौन हो और क्यों पूंछ रहे हो ?”

राजीव को हंसी भी आयी और गुस्सा भी ।

“मैं इस घर का मालिक हूँ । ” राजीव ने थोड़ा रौबीले अंदाज़ में कहा ।

“अच्छा , तुम्हारा नाम ?” गब्बर ने पूंछा ।

राजीव स्वामी ” राजीव ने उत्तर दिया ।

गब्बर चबूतरे से उतरा और बोला , “सब जानते हैं ये चबूतरा तो गब्बर का है । ”

चल भूरे,” उसने कुत्ते को देख कर कहा ।

फिर वो पलट कर चला गया । कुत्ता भी उसके पीछे हो लिया।

सुषमा ने राजीव की आवाज़ सुन ली थी । वह और लड़कियां थोड़ा सा दरवाजा खोल कर राजीव और गब्बर को बातचीत करते देख सुन रहीं थीं । गब्बर के जाते ही सुषमा ने पूरा दरवाजा खोल दिया । सब लोग अंदर चले गये ।

ये आदमी तो सिरदर्द है । इसकी वजह से फ्री हो के बाहर भी नहीं निकल सकते । बच्चियाँ बाहर खेल नहीं सकतीं,” सुषमा बड़बड़ाई ।

“अरे बाहर क्यों नहीं निकल सकते ? वह बैठा ही तो रहता है ,और दूसरे बच्चे तो उसकी उपस्थिति में खेलते ही हैं ,” राजीव बोला ।

पता नहीं कौन है, कैसा आदमी हैं । उसका हुलिया और उसकी आँखें देखीं? मुझे तो डर लगता है, ” सुषमा ने कहा ।

“मैं उसके बारे में पड़ोसियों से पता करूंगा ,” राजीव ने आश्वासन दिया ।

दूसरे दिन राजीव ने बगल के गुप्ता जी से गब्बर के बारे में पूंछा तो वो इतना ही बता पाये कि गब्बर को वह लगभग दो साल से मुहल्ले में देख रहे है । अगली गली में एक भैरों देव का चबूतरा है वहाँ उसने डेरा डाला हुआ है । वह किसी से अधिक बात नहीं करता और किसी को नहीं पता वह कौन है, क्या करता है और कहाँ से आया है ।

क्या गब्बर ने कुछ किया?” गुप्ता ने राजीव से प्रश्न किया।

“ वह अक्सर मेरे घर के आगे चबूतरे पर बैठा रहता है । मेरी पत्नी और बेटियाँ उससे डरते हैं ,” राजीव ने बताया।

“ ये नवंबर है । सर्दी शुरू हो गयी है । आपके चबूतरे पर धूप जल्दी आती है और देर तक रहती है । वह इसीलिए वहाँ आ बैठता है । वह पहले भी बैठता था । उससे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं उसने कभी किसी को हानि नहीं पहुंचायी , ” गुप्ता ने राजीव को आश्वस्त करते हुए कहा ।

गुप्ता जी की बातों से राजेश की चिंता कुछ हद तक कम हुई। उसने घर वापस आकर सुषमा को गुप्ता से गब्बर के बारे में मिली जानकारी दी । सुषमा का भय भी थोड़ा कम हुआ ।

उसके बाद राजीव ने एक दो बार गब्बर को वहाँ बैठने से मना किया । कहने पर वो उठ जाता था लेकिन उसने वहाँ बैठना नहीं छोड़ा । राजीव ने कहना छोड़ दिया । थोड़े दिनों में सुषमा , गुड्डी और छुटकी के मन से भी गब्बर का डर निकल गया । गुड्डी और छुटकी बाहर निकल कर मुहल्ले के बच्चों के साथ खेलने लगीं ।

धीरे धीरे सुषमा को भी गब्बर की उपस्थिति का अभ्यास हो गया । अब तो जब कभी उसकी कृशकाय देखकर उसे तरस आता और वह बचा हुआ खाने का समान उसे दे देती थी जिसे वह चुपचाप ले लेता । न कभी उसने कुछ मांगा और न कभी लेने से मना किया । कुत्ता भूरे भी उसके साथ कुछ खाना पा जाता । भूरे भी वफादारी निभाने लगा । किसी अपरिचित को राजीव के चबूतरे पर चढ़ने नहीं देता ।

सर्दियाँ बीत गयीं अप्रैल आ गया और गर्मी की शुरुआत हो चुकी थी । गब्बर का चबूतरे पर बैठने का सिलसिला कम होते होते लगभग बंद हो गया । भूरे गली में अब भी घूमता दिख जाता था लेकिन गब्बर जब कभी शाम को आकर थोड़ी देर बैठ जाता और बच्चों को खेलते देखता ।

फिर उसका आना एकदम बंद हो गया । सुषमा का ध्यान कभी कभी गब्बर की ओर चला जाता ;खास तौर पर शाम को जब बच्चे बाहर खेलते । गब्बर और भूरे की उपस्थिती में उसे लगने लगा था बच्चे किसी की निगरानी में हैं और वो गुड्डी और छुटकी की तरफ से निश्चिंत रहती थी ।

उसे कभी खुद से आश्चर्य होता और सोचती , “बिन बोले, व्यवहार से भी भरोसा कायम हो सकता है!”

गब्बर का भरोसा ऐसा ही तो था ।

*****

अहसास

अरुण को पिछले एक माह से फोन, फेसबुक, व्हाट्सप सभी पर बधाइयाँ मिल रहीं थीं । उनके इकलौते बेटे  शिवम को पूना से एम बी ए करने के बाद बहरीन में किसी अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गयी थी ।

   शिवम जाने की तैयारी में लगा था । आशा शिवम से कई बार पूंछ चुकी थी, “शिवम बेटा बाहर जाना क्या जरूरी है ?”

  शिवम का जवाब था, “हाँ माँ ,अच्छी कंपनी है ,तंख्वाह भी अच्छी दे रहे हैं ।

  अरुण अपनी पत्नी आशा के मन की दशा समझते थे। उनका खुद का मन बैठा जाता था लेकिन प्रगट में सामान्य बने रहते ।

  शिवम की माँ ने फिर कहा , “ इंडिया में कोई काम नहीं है क्या ? इतनी बड़ी दिल्ली है खोजेगा तो यहीं कोई नौकरी मिल जायेगी ।

  “मम्मी,मुझे एसी वैसी कोई भी नौकरी नहीं करना है । ज़िंदगी में आगे बढ्ना है । फिर बहरीन कोई ज्यादा दूर थोड़े ही न है।शिवम ने थोड़ी सांत्वना देते हुए कहा।

  “अभी बहरीन है, थोड़े दिनों बाद अमेरिका रूस की बात करेगा ।

  “कहीं भी हो मम्मी हवाई जहाज से आने जाने में कितना समय लगता है?

  अरुण चुप चाप ये संवाद सुन रहे थे । उन्होंने उच्छ्वास लिया और मन ही मन कहा जाने में समय नहीं लगता लौटने में कभी सदियां लग जातीं हैं ।

  वो दिल्ली से बनारस अपनी माँ के अंतिम संस्कार में समय पर नहीं पहुँच पाये थे । साधारण में भी कितने लंबे अंतरालों में वो अपने वयोवृद्ध पिता से मिलने बनारस जा पाते हैं। दिल्ली से बनारस क्या इतना अधिक दूर है ? लेकिन उन्होंने न कभी अपनी इच्छा शिवम पर थोपी थी न अभी वो कोई दखल देना चाहते थे । फिर शिवम सुनता क्या ? वो समय और था जब माँ बाप का ज़ोर बच्चों पे चलता था । लेकिन तब बच्चे कभी कभी घुटन महसूस करते थे । फिर लड़के के भविष्य का सवाल था कैसे रोकते ।

  आशा से नहीं रहा जा रहा था । उसने अरुण की ओर देखा , “आप कुछ कहिये ।

  “शिवम कभी तुमने सरकारी नौकरी के बारे में विचार नहीं किया?

  “नहीं।शिवम का संक्षिप्त जवाब था ।

  अरुण ने आशा को समझाया । शिवम ने सोच समझ कर निर्णय लिया है । आजकल क्या क्या केरियर चोईस हैं मुझे भी जानकारी नहीं । हम लोग तो सिर्फ डॉकटरी या इंजीनियरिंग को ही अच्छे कैरियर के रूप में जानते थे । वो नहीं बनपाये तो रेल्वे और बैंक वगैरह में नौकरी खोजते थे । अब अनेक नई लाइनें खुल गईं हैं ।

  थोड़ी देर बाद जब शिवम किसी काम से बाहर गया । अरुण ने पत्नी को समझाया, “उसे जाने देना होगा । हम लोग उसे हंसी खुशी विदा करेंगे वरना वो निश्चिंत हो के नहीं जा पायेगा। तुम खुद को संभाल लेना । आशा चुप रही ।

  आशा ने वाकई खुद को संभाल लिया । जाने वाले दिन अरुण और आशा ने शिवम को एयरपोर्ट पर मुस्कराते हुए विदा किया। दर्शक दीर्घा से शिवम के हवाई जहाज को तब तक निहारते रहे जब तक वो उड़ नहीं गया ।

  एयरपोर्ट से वापस पश्चिम विहार में अपने निवास को लौटते हुए कार में अरुण और आशा दोनों चुप चाप बैठे रहे । दोनों ही भावनाओं को जब्त किये हुए थे । घर में प्रवेश करते ही आशा का धैर्य छूट गया ।

  उसने दरवाजा बंद किया और उसकी रुलाई फूट पड़ी । अरुण ने उसे पकड़ कर सोफ़े पर बिठाया और खुद भी बैठ गये  । आशा थोड़ी देर अरुण के कंधे पर सर रख कर रोती रही । अरुण उसकी पीठ पर हाथ फेरता रहा । मन तो उसका भी विचलित था लेकिन उसने स्वयं की भावनाओं पर नियंत्रण रखा ।

  आशा की रुलाई जब थमी तो अरुण ने मज़ाक करने की कोशिश की । वह  बोला, “तुम तो ऐसे रो रही हो मानो बेटी को ससुराल विदा करके आ रही हो ।

  “काश हमारे एक बेटी भी होती,”आशा बोली ।

  रात को बिस्तर पर लेटे हुए वो सोच रहा था वह भी कभी नौकरी के लिए घर छोड़ आया था ।

  अरुण के पिता की  एक छोटी सी कपड़ों की  दुकान थी किन्तु उससे पर्याप्त आय हो जाती थी । अरुण का एक बड़ा भाई था भानु ,एक बड़ी बहन थी शशि । माँ रमा देवी गृहणी थीं । बड़े भाई ने बी ए तक पढ़ाई की और पापा के साथ दुकान में हाथ बटाने लगे ।

  अरुण घर में सबसे छोटा था इसलिए सबका लाड़ला था । उसने एम कॉम तक पढ़ाई की थी । इस बीच बड़ी बहन शशि का विवाह हो चुका था । पिता कभी कभी कहते , “खाली समय में कभी कभी दुकान पर आ जाया करोवह चुपचाप सुनकर टाल जाता । उसकी न जाने क्यों व्यापार में जरा भी रुचि नहीं थी । वह कोई नौकरी करना चाहता था । जिसमें नियमित दिनचर्या ,निश्चित आय ,घाटे और लाभ की चिंता नहीं ,समय समय पर अवकाश की सुविधा होती है ।

  घर वालों ने भी उस पर ज़ोर नहीं डाला । वह पढ़ने लिखने में ठीक ठाक था थोड़े हाथ पैर मारने के बाद उसे दिल्ली में स्थित एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गयी । फिर आशा से उसकी शादी हुई । कुछ साल तो नये शहर को जानने समझने और गृहस्थी जमाने में निकल गये । तीज त्योहार बनारस जाना होता रहा । फिर शिवम का जन्म हुआ कुछ व्यस्तता बढ़ी। शिवम ने स्कूल जाना शुरू किया । जैसे जैसे शिवम की उम्र और पढ़ाई बढ़ी अरुण और आशा की वयस्तता बढ़ती गयी। तीज त्योहार बनारस जाना बंद हो गया । स्कूल की छुट्टीयों में ही जाना संभव होता। घर जाने का अंतराल बढ़ता गया । कुछ साल पहले जब अरुण की माँ गुजरीं वो कम्पनी के काम से आस्ट्रेलिया गया हुआ था । हालात कुछ ऐसे बने कि समाचार मिलने पर भी वह जल्दी न लौट सका और माँ का अंतिम संस्कार उसके पहुँचने के पहले ही कर दिया गया था ।

  तभी फोन की घंटी बजी । आशा ने फोन उठाया । शिवम का फोन था ।

  “हैलो,” शिवम की आवाज़ आयी ।

  ‘हैलो, शिवम ।

  “मम्मी, मैं यहाँ पहुँच गया ।

  “सब ठीक है, खाने पीने का खयाल रखना। अभी कहाँ ठहरा है ।

  “अभी कम्पनी के गेस्ट हाउस में ठहरा हूँ।

  “लो पापा से भी बात कर लो”, ये कहते हुए आशा ने अरुण को फोन दे दिया ।

  “हैलो शिवम कैसे हो?

  “ठीक हूँ ।

  “कोई जरूरत पड़े अग्रवाल अंकल से संपर्क कर लेना।

  “कर लूँगा पापा । गुड नाइट

  “गुड नाइट ।

  दिनेश अग्रवाल अरुण के एक मित्र थे और बहरीन में एक सीमेंट प्लांट में इंजीनियर थे । उन्होंने उनका फोन नंबर शिवम को दे दिया था ।

  बातचीत समाप्त होने पर फिर दोनों बिस्तर पर लेट गये ।

  आशा बोली , “शिवम कितनी जल्दी बड़ा हो गया ?”

  “हूँ ।अरुण का संक्षिप्त जवाब था ।

  “लगता है अभी थोड़े ही दिन हुए मैं उसे तैयार कर स्कूल भेजती थी ।

  “समय बहुत तेजी से गुजरता है ।अरुण बोला ।  

   सुबह अरुण ऑफिस चले गये । आशा गृहकार्य में लग गयी । बीच बीच में चौंक जाती अरे शिवम के खाने का टाइम होने वाला है’, फिर याद आता वह तो परदेश में है । मन करता फोन करके पूंछे फिर टाल जाती कि कोई जरूरी काम में न उलझा हो और उसे डिस्टर्बेंस हो । सोचा शाम को अरुण के आने पर दोनों लोग बात कर लेंगे । दिन भर बेचैनी में काटा ।

  शाम को अरुण का फोन आया और उसने बताया एक जरूरी मीटिंग है वह देर से घर आयेगा ।

  अरुण को आते आते रात के नौ बज गये। आते ही हाथ मुंह धोकर कपड़े बदले और बैठक में टीवी खोलकर बैठ गये । आशा ने वहीं खाना लगा लिया और दोनों ने टीवी पर समाचार देखते हुए खाना खाया । दोनों को ही भूख कुछ खास नहीं थी किन्तु एक दूसरे का ध्यान रखते हुए खा लिया क्योंकि एक अनिच्छा दिखाता तो दूसरा भी नहीं खा पाता ।

  खाने के बाद आशा बोली , “शिवम को फोन लगायेँ ।

  अरुण ने घड़ी देखी लगभग ग्यारह बज रहे थे उन्होने अंदाज़ा लगाया  और आशा को बताया बहरीन में उस समय लगभग साढ़े आठ बज रहे होंगे । उन्होने अपने मोबाइल से शिवम को फोन लगाया और आशा को पकड़ा दिया । आशा ने काफी देर तक बात की उसमें उसने शिवम के ऑफिस,निवास,दिनचर्या, खाने पीने सब की जानकारी ली और अपने दिनभर के बारे में बताया। बाद में अरुण ने भी एक दो वाक्यों में बात कर बाय कर दिया ।

  आशा किचिन में बर्तन साफ करने चली गयी जैसा की उसकी दिनचर्या का हिस्सा था वो रात को बर्तन और किचिन दोनों साफ और व्यवस्थित करने के बाद ही सोती थी ।

  अरुण को नींद आ रही थी सो वह बेडरूम में बिस्तर पर आकर लेट गये । लेकिन लेटते ही उनकी नींद गायब हो गयी।

  जबसे शिवम गया था उनको एक बात रह रह कर ध्यान में आ रही थी । उन्होंने कभी ये सोचा ही नहीं था कि उनके माँ बाप को कैसा लगा होगा जब वो नौकरी के लिये अपना घर शहर सब छोड़ के आये थे। और तब तो संपर्क के इतने साधन भी नहीं थे । मिलने देखने के लिए महीनों ,सालों इंतजार करना पड़ता था ।

  जब आशा काम खतम कर कमरे में आयी तो अरुण ने कहा , “यात्रा की तैयारी कर लेना हमलोग बनारस चल रहे है पिताजी के पास । वहीं से तुम्हारे घर लखनऊ चलेंगे तुम्हारे मम्मी पापा के पास ।

  “यूं अचानक? और तुम्हारी छुट्टी ?”

  “छुट्टी मिल जाएगी नहीं तो कंपनी की छुट्टी कर दूँगा। तीन साल से हम लोग अपने माता पिता से नहीं मिले । ये कोई बात है?

  फिर उन्होने एक ट्रैवल एजेंट को फोन कर बनारस जाने के लिए किसी भी फ्लाइट में और किसी भी क्लास में दो टिकेट बुक करने को कहा । आशा यात्रा की तैयारी में जुट गयी और सब समान ठीक करके ही सोई ।

  बनारस पहुँचने पर अरुण के घर में सब खुश थे । पिता ने पूछा, “अचानक कैसे प्रोग्राम बन गया ?

  अरुण ने कहा , “आना तो बहुत दिनों से चाह रहे थे। अब आना हो सका । आप लोगों की याद भी बहुत आ रही थी ।

  पिताजी ने कहा , “खैर अच्छा हुआ जैसे भी आए भले आये। विदेश जाने से पूर्व शिवम भी एक बार यहाँ हो जाता

  “छुट्टियों में जब आएगा तो यहाँ हो जाने को कहेंगे । बल्कि हम सब साथ में फिर आ जायेंगे ।

  पिता के चेहरे पर खुशी छलक रही थी  जिसे देखकर अरुण और आशा दोनों को आत्मिक प्रसन्नता महसूस हो

रही थी।

*****


मंकी बंदर

सर्दी की एक दोपहर की गुनगुनी धूप में बंदरों का एक समूह पप्पू की छत पर सुस्ता रहा था । घर के लोग सब बाहर गए हुए थे इसलिए छत खाली थी सो इन बंदरों ने वहाँ डेरा जमाया हुआ था । कुछ छोटे बंदर यहाँ वहाँ उछलते कूदते खेल रहे थे । इनमें मंकी बंदर भी था। यह नाम उसे पप्पू ने दिया था । पप्पू उस घर के मालिक का बेटा था और पास की प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था । पप्पू से जब उसका सामना होता था वह उसे मंकी कह कर बुलाता था । वह कभी अभी उसे कुछ खाने को भी देता था ।

पप्पू के घर के बड़े सदस्य बंदरों के शत्रु थे । वे जब भी उन्हें छत पर या घर के आस पास देखते पत्थर या लाठी दिखाकर डराते और खदेड़ कर भगाते थे । लेकिन इसमें उनके अकेले का दोष नहीं था । बंदरों की आदत थी कि खुले में किसी का कोई सामान जैसे बर्तन कपड़ा इत्यादि पा जाते तो उठा कर भाग जाते । फिर लोगों को अपना सामान वापस पाने के लिए उनके पीछे भागना पड़ता था ।

ये असल में बंदरों की चाल थी । जब वो किसी का कोई सामान उठा ले जाते वो दूर नहीं जाते वल्की छत कि मुंडेर पर या आसपास के पेड़ों पर चढ़ जाते और वस्तु के मालिक को दिखा दिखा कर चिढ़ाते । लोग सामान वापस लेने के लिए रोटी का टुकड़ा ,चना या अन्य कोई खाने कि चीज इनकी ओर फेंकते तो वे सामान छोड़ देते और खाने कि चीज कि ओर लपकते । लोग अपना सामान ले लेते । ये आए दिन होता था । खाना न मिलने पर वो लोगो को ख़ूब छकाते और कपड़ा तो दांतों से फाड़ ही डालते थे । तब मनुष्यों और इनके बीच कटुता बढ़ जाती । अपितु ये स्थिति कम ही आती । लोग नुकसान से बचने के लिए जल्दी ही उन्हें खाने की वस्तु दे देते थे। वैसे तो आसपास के बाग बगीचों ,खेत खलिहानों से भी उन्हें भोजन उपलब्ध था लेकिन इन्सानों के साथ आँख मिचौली का अलग मज़ा था । बच्चों को डराने ,चिढाने और उनके साथ खेलने में भी बड़ा आनंद था । हालाकि उनसे बच के भी रहना होता था । कुछ बच्चे अकारण भी उनके पीछे पड़ जाते और पत्थर भी मारते थे । फिर भी दिन मज़े के थे।

गाँव मेँ अभी टेलीवीजन नहीं पहुंचा था । केबल टीवी की आमद अभी दूर थी ।

तभी एक दिन पता चला गाँव मेँ टीवी आ गया। दूसरे दिन मुखिया के घर टीवी आ गया । मकान की छत पर टीवी एंटीना लग गया । बंदरों के लिए ये नयी और कौतूहल जनक वस्तु थी । छत खाली होते ही मंकी बंदर और उसके समूह के छोटे बड़े सदस्य वहाँ पहुँच गए । सभी एंटीना देख कर उत्सुक और उत्तेजित थे । बच्चों को डांट कर उसके पास जाने से मना किया गया था । मंकी बंदर का चाचा ,जो समूह का सबसे स्मार्ट बंदर था आगे बढ़ा । पहले उसने हाथ से छूकर देखा फिर दाँत से काटकर देखा । जब ऐसा करके उसे कुछ न हुआ तो उसकी हिम्मत बढ़ गयी और स्वभाव बस वो उसे हिलाने लगा और फिर उससे लटक कर झूल ही गया । तभी मुखिया का लड़का एक डंडा लेकर छत पर चढ़ आया और बंदरों की तरफ मारने दौड़ा। सारे बंदर भाग खड़े हुए। कुछ कूदकर पड़ोस की छत पर चले गए और कुछ पास के पेड़ पर चढ़ गए । लड़का एंटीना को ,जो एक तरफ झुक गया था ठीक करके चला गया ।

कुछ ही दिनों में गाँव के घर घर में टीवी आ गये  । मकानों की छतों और खपरेलों पर वैसे ही एंटीने लग गए ।

कुछ ही दिनों में गाँव के माहौल में कुछ बदलाव आया।  मंकी और उसके साथियों को लगने लगा था कि कुछ अजीब घट रहा है ।

शाम होते ही गली बाज़ार मुहल्ले खाली से हो जाते । लोग अपने घरों में दुबक जाते । बच्चे पहले जैसे गली मुहल्ले में या छतों पर धमाचौकड़ी नहीं मचाते उनके पीछे भी नहीं भागते । मंकी बंदर का दोस्त पप्पू भी रोटी लेकर उससे मिलने छत पर नहीं आ रहा था ।

दिन मायूसी में गुजरने लगे

ऐसे ही एक रोज गाँव सुनसान था । मंकी बोर हो रहा था । उसने पप्पू के घर कि बैठक के रोशनदान में झांक कर देखा । टीवी पर क्रिकेट का खेल चल रहा था । पप्पू कि माँ को छोड़ कर घर के सभी सदस्य टीवी के सामने बैठे खेल देख रहे थे । उसने कुछ और घरों का भी जायजा लिया । सब जगह टीवी पर वही खेल चल रहा था और लोग टीवी के सामने बैठे थे । मंकी का मन नहीं लग रहा था । वो पप्पू कि छत पर जाकर अकेला ही बैठ गया बड़ी ऊबन हो रही थी ।

तभी उसे कुछ याद आया । जब उसके चाचा ने मुखिया के टीवी एंटीना को हिलाया था तो मुखिया का लड़का तुरंत छत पर आगया था । उसे कुछ सूझा । काम थोड़ा जोखिम भरा था लेकिन उससे रहा नहीं जा रहा था ।

उसने अपने सारे दोस्तो को इकठ्ठा कर एक गुपचुप मीटिंग की और सबको वैसा करने को राजी कर लिया जैसा उसके दिमाग में विचार आया था ।

अगली शाम मंकी बंदर और उसके बहुत से साथी मोहल्ले की छतों पर चढ़ गए जहां एंटीने  लगे थे । सभी लोग घरों के अंदर टीवी देखने में व्यस्त थे । मंकी पप्पू की छत पर था । उसने एक चीख की आवाज़ निकाली और टीवी एंटीना पर चढ़ गया और उसे झकझोरने लगा । ये सभी बंदरों के लिए संकेत था । सभी एंटीनाओ पर चढ़ कर झूल झूलकर उन्हें हिलाने लगे । थोड़ी देर वो एसा कर के भाग कर आस पास के पेड़ों पर चढ़ गये और वहाँ से मोहल्ले का नजारा देखने लगे ।

उन्होने देखा कि कुछ लोग घरों से बाहर आये । कुछ लोग ऊपर जाकर एंटीना ठीक करने लगे । कुछ लोग बाहर आकर आपस में कुछ बातचीत करने लगे । कुछ बच्चे  बाहर निकल कर खेलने लगे । कुछ बच्चों ने उन्हें देख लिया और बंदर बंदर कहकर चिल्लाने लगे । थोड़ी देर के लिए ही सही मोहल्ले में रौनक हो गयी । मंकी बंदर और उसके साथियों को इससे बहुत मज़ा आया ।

अब तो जब भी वो बोर होते एंटीने हिला कर भाग जाते।

इन्सानों को छेडने  का एक नया जरिया उन्हें मिल गया था ।

*****

 


विस्थापित

 वाशिंगटन युनिवर्सिटी ने भारत में बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी में ग्लोबल वार्मिंग पर होने वाले अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के लिये प्रोफेसर राजेश को चयनित किया था ।

यूनिवर्सिटी से घर की ओर कार चलाते हुए वह सोच रहा था कि इस समाचार पर दादाजी की क्या प्रतिक्रिया होगी।

वो कितने खुश होंगे !

  राजेश के दादा जी डॉ हरपाल की उम्र 78 वर्ष थी । अपनी जवानी के दिनों में वो हिंदुस्तान से उच्च शिक्षा के लिये अमेरिका आये थे । फिर हालात कुछ ऐसे बने कि वहीं एक भारतीय मूल की लड़की से शादी करके बस गये उनका एक ही बेटा था गुरजीत जो ऑटो पार्ट्स का व्यापार करता था । गुरजीत की शादी भी अमेरिका में बसे भारतीय परिवार की लड़की से हुई थी । संयोग से गुरजीत  की एक ही संतान थी राजेश जो पढ़ लिख कर वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हो गया था । उसने एक अमेरीकन लड़की से शादी की थी । डॉ हरपाल ने वाशिंगटन में केंट में एक क्लीनिक खोला था और वहीं पास में एक बड़ा सा मकान बना लिया था । कुछ साल पहले उनकी पत्नी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था । माता पिता भारत में पहले ही गुजर चुके थे । तब वो भारत जाकर आये थे । डॉ हरपाल इस बात से खुश रहते थे कि उनका परिवार एक साथ एक ही छत के नीचे रहता था । राजेश को अपने दादाजी से खास लगाव था और उन्हें राजेश से ।

  राजेश घर पहुँच कर सीधा दादाजी के कमरे में गया और बोला , “दादाजी यूनिवर्सिटी की तरफ से मुझे एक सेमिनार के लिये भारत जाना है ।

अच्छा! कब ?”

अगले हफ्ते 15 अप्रैल को ।

ये तो बड़ी अच्छी खबर है । बहू को भी ले जा उसने अभी इंडिया नहीं देखा है ।

आप भी चलिये ।

तुझे तो मालूम है मैं नहीं जा सकता ।हरपाल ने अपने दिल की तरफ इशारा किया । कुछ दिनों से उन्हें सीने में दर्द की शिकायत थी ।

फिर जैसे उन्होंने खुद से कहा , “चिंता नहीं ,मरने के पहले एक बार जरूर जा के आऊँगा ।

थोड़ी देर बातचीत करने के बाद राजेश अपने कमरे में चला गया ।

 

भारत के जिक्र ने डॉ हरपाल की पुरानी यादों का पिटारा खोल दिया । वो उन यादों में खो गए ।

डॉ हरपाल  का बचपन अविभाजित भारत के अमृतसर शहर में हुआ था । भारत -पाक विभाजन के वक्त हरपाल की उम्र लगभग सात साल रही होगी । उस कच्ची उम्र में उन्होंने विभाजन की त्रासदी और विभीषिका को करीब से देखा था जो कभी वो भुला नहीं पाये थे।

 डॉ हरपाल के पिता सुरजीत और रहीम चाचा साथ मिलकर कपड़े का व्यवसाय करते थे और दोनों की दाँत काटी रोटी थी यानि बहुत गहरी दोस्ती थी ।

यहाँ तक कि सुरजीत और रहीम ने मिलकर एक बड़ा सा मकान खरीदा था और अपनी सुविधा से उसे दो हिस्सों में बाँट लिया था । इसके लिये उन्होंने आँगन में एक दीवार खड़ी करवा दी थी लेकिन उसमें एक दरवाजा बनवा दिया था जो अधिकतर खुला रहता था और दोनों परिवार इस दरवाजे से कभी भी एक दूसरे के हिस्से में आ जा सकते थे । हरपाल तब उस दरवाजे से कभी यहाँ कभी वहाँ मरजीना आपा के साथ खेलता रहता था । ज़रीना चाची हरपाल को अपने बेटे जैसा प्यार करतीं थीं और अक्सर उसकी मनपसंद जलेबियाँ बनाकार खिलातीं थीं । मरजीना आपा उसके साथ खेलतीं भी थीं और पढ़ाई में मदद भी करतीं थीं। वो उससे तीन या चार साल बड़ी रही होंगी  । हरपाल के माता पिता मरजीना को अपनी बेटी की तरह मानते और खयाल रखते थे । संयोग से दोनों मित्रों के एक एक संतान ही थी । दोनों परिवारों की ईद और दिवाली सांझा होते थे ।

हरपाल सुनता रहता था कि अंग्रेज़ भारत छोड़ कर जाने वाले है । भारत आज़ाद होने वाला है ।  फिर पता चला भारत को बांट कर दो देश बनाए जाएंगे एक हिंदुस्तान  और दूसरा पाकिस्तान । पाकिस्तान मुसलमानों का देश होगा । जो लोग अपने आप से हिंदुस्तान  से पाकिस्तान में जाकर रहना चाहें रहें और पाकिस्तान से जो हिंदुस्तान  में आकर बसना चाहें बसें ।

आज़ादी मिली लोगों ने जश्न भी ठीक से नहीं मनाया होगा शहर में दंगे फसाद शुरू हो गये । जहां हिन्दू शक्ति शाली थे मुसलमान मारे गये और जहां मुसलमानों का ज़ोर चला हिंदुओं का कत्लेआम हुआ । पाकिस्तान से हिंदुओं को खदेड़ने की कोशिशें हुईं और कहीं कहीं  हिंदुस्तान से मुसलमानों को । एसा सीमावर्ती इलाकों में अधिक हुआ और बहुत से लोग मजबूरी में यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ विस्थापित हो गये ।

हरपाल के पिता सुरजीत ने बलवाइयों से किसी तरह रहीम और उसके परिवार को बचाया । रहीम चाचा ने तय किया उनके मामा रावलपिंडी में रहते हैं वो सपरिवार थोड़े दिनों  के लिये उनके पास चला जायगा । जब हालत सामान्य हो जायेंगे वो वापस आ जायेंगे ।

लेकिन वो गये तो फिर कभी लौटे ही नहीं , न उनकी कोई खबर मिली । हरपाल के पिता को शक था कि शायद वो रास्ते में कहीं दंगाइयों के हाथों मारे न गये हों।

डॉ हरपाल को अब भी याद था ज़रीना चाची जाते समय उसे गले से लगा कर फूट फूट कर रोईं थी । दोनों परिवार रोये थे ।

ये सब बातें याद करके डॉ हरपाल की आँखें भर आयीं । उनका मन रोने को हो आया लेकिन उन्होंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर लिया क्योंकि उसी समय राजेश उनकी दवाइयाँ लेकर उनके पास आ गया था ।

राजेश ने हरपाल से पूंछा , “आपको इंडिया से कुछ चाहिये

हरपाल ने कहा , “अमृतसर में  बड़े बाज़ार में हकीमजी की गली में जहां अपना पुराना मकान था जाकर बुजुर्गों से पूंछना कि रहीम चाचा या उनके परिवार का कोई कभी वहाँ लौट कर आया था ?”

राजेश ने कहा , “हाँ मैं वहाँ जरूर जाके आऊँगा ।

यह कहते हुए राजेश की आँखें भी नम हो आयीं थीं । 

*****

 

समर्पण

मेरे चाचा पं श्री श्रीनाथ गोस्वामी

मेरी पत्नी श्रीमती केश कुमारी गोस्वामी एवं पुत्री कु॰ दिविता गोस्वामी 

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MERI PRATINIDHI KAHANIYAN

ISBN No. :

Publisher : Yourbookstall.com

Author Name : Ravi Ranjan Goswami

Availability : Available

Binding : Not Applicable

Language : Hindi

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Rs. 49.00


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MERI PRATINIDHI KAHANIYAN

Short stories inspired by social conditions around.

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