chapter1

तन्हा गुजरता हूँ

अजीजों में भी हरपल तन्हा गुजारता हूँ
ख्वाबों की लकीरों में किसे उभारता हूँ

दूर तलक नहीं है परछाई किसी की
पर किसकी राह इस कदर निहारता हूँ

आ जा मेरी पहलू में बैठ ऐ खिज़ा
तूफां से उलझा तेरा हुस्न संवारता हूँ

बेमुरव्वत हो गई है आज कल चांदनी भी
भरम दूर कर लू इसलिए दुलारता हूँ

देख ली दुनिया वालों से करके वफा
अब खुदा के ऊपर नियत बिगारता हूँ

मेरी सदा के सिवा कोई आता नहीं
'दिलजले ' किसी को जब भी पुकारता हूँ

chapter2

 ग़ज़ल बेचीं है
कल यरों मैंने अपनी एक ग़जल बेचीं है
आज लगता है जैसे अपनी फसल बेंची है

हो गए तार तार एक ऑरत की आज आबरू
आज फिर किसी ने मर्द के लिया तन बेचीं है

कल बेचेगा अपनी बेटी, यह हकीकत है
आज शराब के लिए उसने बहन बेचीं है

सदियों से चला आया बहस चलता ही रहेगा
क्यों बेटे ने ही अपने बाप की कफन बेचीं है

हाथ से निकला तब जा कर पता चला
पत्थर के रूप में मैंने अनमोल रतन बेचीं है

chapter3

 ऐसी उम्मीद न थी
थी आपसे बेशक, पर ऐसी उम्मीद न थी
खुद टूट के बिखर जाओ, ऐसी जिद न थी

पिछले बार की तरह, उम्मीद थी शेवैया की
पर पी रहे हैं खून, ऐसी तो कभी ईद न थी

बनाया था मक़ा तेरी इबादत के लिया खुदा
अब बनते हैं मजहबी गुंडे, ऐसी मस्जिद न थी
×

Bashar dhundhata hun

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Publisher : Yourbookstall.com

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Availability : Available

Binding : Not Applicable

Language : Hindi

Fulfilled By : Not Applicable

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Bashar dhundhata hun

प्रकथन
जब कभी यह प्रश्न पूछा जाता हैं कि गजल क्या हैं तो सवाल सुन कर मन कुछ उलझन में पड़ जाता हैं। क्या यह कहना ठीक होगा कि गजल जज्बात और अलफाज का एक बेहतरीन गुंचा या मज्मुआ हैं? या यह कहें कि गजल उर्दू शायरी की इज्जत हैं, आबरू है? लेकिन यह सब कहते वक़्त मन में एक प्रश्न उभरता हैं कि क्या यह सच हैं! माना कि गजल उर्दू काव्य का एक अत्यंत लोकप्रिय, मधुर, दिलकश और रसीला अंदाज हैं मगर यह भी उतना ही सच हैं कि उर्दू साहित्य में गजल चर्चा का एक विषय भी बनी रही हैं। एक तरफ तो गजल इतनी मधुर हैं कि वह लोगों के दिलों के नाजुक तारों को छेड देती हैं और दूसरी ओर वही गजल कुछ लोगों में कुछ ऐसी भावनाएं पैदा करती हैं कि जनाब कलीमुद्दीन अहमद साहब इसे ‘नंगे-शायरी’ यानी बेहूदी शायरी कहते हैं।
    गजल के इतिहास को देखें तो बादशाहों, अमीर उमरावों आदि की प्रशंसा में लिखे जाने वाले कसीदे का पहले तो फारसीकरण हुआ, तत्पश्चात्य ईरान के शायरों में उसकी तशबीब (शृंगारिक भूमिका) को कसीदे से अलग करके उसका नाम गजल रखा (गजल अर्थात प्रेयसी से वातार्लाप) ईरान में यह विधा बहुत फूली-फली तथा लोकप्रिय हुई। वस्तुत: भारतवर्ष को यह विधा ईरान की ही देन है। अमीर खुसरो ने खिलजी शासनकाल में, उस समय की बोली जाने वाली भाषा में कुछ अरबी-फारसी शब्दों का मिश्रण करके एक नई भाषा विकसित की थी, जिसका नाम उन्होंने हिंदी/ हिंदवी रखा था और इस भाषा में उनके द्वारा कुछ गजलें भी कही गईं थीं, इसलिये उनको हिंदी भाषा का  आविष्कारिक तथा हिंदी का पहला गजलगो शायर माना जाता है। यह और बात है कि हिंदी के काव्य क्षेत्र में बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, सूर्यभानु गुप्त आदि गजल लिख रहे थे, परंतु इसे स्थापित करने का श्रेय दुष्यंतकुमार को प्राप्त हुआ है।

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Publisher SCHOLASTIC
Author Name NONE
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